January 21, 2011

चिड़ियाँ की कहानी

तिनका-तिनका जोड़ -जोड़ कर
बना सुघड़ सुन्दर इक घर
फुदक रही इसमें इक चिड़ियाँ            
 फैलाकर के अपना पर  

अभी-अभी आई दुनियां में
इसे कहाँ इस जग की खबर         
छुप गया सूरज हुआ अँधेरा
लगाने लगा चिड़ियाँ को डर

लिपट गई वो माँ से जाके   
बड़े - बड़े पर के अन्दर
नींद बहुत फिर आई उसको
उठी तभी जब हुआ सहर
  
धीरे -धीरे गुजर गया पल
बढ़ने लगे चिड़ियाँ के पर
लगी हौसला देने माँ फिर
आजा पास मेरे उड़कर

माँ सिखलाती उड़ने के गुण
चिड़ियाँ का मन इधर-उधर
मन के अन्दर मची खलबली
इकटक देख रही अम्बर

माँ ने हाँथ पकड़ के उड़ाया
मिला उसे सपनों का सफर
आया जोश चिड़ियाँ को इतना
उड़ने लगी स्वच्छंद होकर

खो गई वो अपनी ही धुन में
ऊपर -ऊपर और ऊपर
अनसुनी करती ही जाती
माँ का कहना भी सुनकर

तभी अचानक उसने देखा
खड़ा पेड़ आगे आकर
याद न आया बचने का गुर
उलझी टहनी में जाकर

लगा एक पल मौत आ गई
इतने जख्म हुए तन पर
अटक-लटक के टहनी-टहनी
गिरी जमीं पर फिर आकर

खुली आँख तब उसने देखा
सहला रही माँ उसके पर
जगह -जगह से टूट चुके थे
उसके सुन्दर कोमल पर

देती ढाढस चिड़ियाँ को माँ
तरह - तरह से समझाकर
दुःख से चिड़ियाँ फिर भी व्याकुल
आंसू गिरते झर - झर कर

अब शायद वो उड़ न सकेगी
उग न सकेंगे टूटे पर
हो कैसे निर्वाह ये जीवन
खड़ी समस्या है आकर

धीरे-धीरे घाव भर गए
लौटे कई मौसम आकर
लेकिन मन के घाव मिटे ना
लौटी ना खुशियाँ जाकर

पड़ी घोंसले में गुमसुम सी
तकती चिड़ियाँ बस अम्बर
हारी माँ समझाकर उसको
सिमटी वो खुद में छुपकर

इक दिन माँ गई दाना चुगने
साँझ ढला ना आई घर
भूखी प्यासी बाट जोहती
तडपे चिड़ियाँ रह-रह कर

इसी आस में कई दिन बीतें
आएगी माँ अन्न लेकर
लेकिन माँ वापस ना लौटी
रोई वो माँ - माँ करकर

अब तो भूखा रहा न जाए
 जाना होगा खुद उड़कर
 इस डाली से उस डाली पर
 जाए कैसे लगता डर

 याद किये फिर माँ की बाते
 कैसे हिलाए जाते पर
 अब चाहत बस दाने की थी
नहीं लुभाता था अम्बर

धीरे -धीरे सरक-सरक के
चढ़ी वो डाली के ऊपर
साहस करके पर फैलाया
उडी विश्वास मन में भर कर

खुद को उड़ता देख - देख के
आता हौशला बढ़ -बढ़ कर
तरह-तरह के फल और पौधे
पास बुलाते ललचा कर

कई दाने फिर वो चुग लाई
खाया चिड़ियाँ ने जी भर
फिर से उड़ना सीखी चिड़ियाँ                                  
अपने साहस के दम पर

उसे हुआ एहसास की जीवन
होता है कितना सुन्दर
संभल-संभल के चलने का गुण
सिखा जाता है गिरकर



January 12, 2011

तितलियाँ

इठलाती तितलियाँ , कुछ बलखाती तितलियाँ
छोटी-छोटी बातों पे भी , खिलखिलाती तितलियाँ

इस डाल से उस डाल पे , हर डाल पे बैठे
आती नहीं है हाथ में , उड़ जाती तितलियाँ

जो आ गया करीब , फिर न दूर जा सका
जो दूर हो उसे पास , बुलाती तितलियाँ    

दंग है जमाना इनके , जलवों के आगे
नखरों से सबके होश , उड़ाती तितलियाँ  

अब कौन करे मंदिरों में , पूजा अर्चना
आजकल तो है दिलों में , पूजाती तितलियाँ   

वो भूल गया अपने , सारे सपने इरादे 
है आजकल तो सपनों में , आती तितलियाँ 

उड़ गए सब संस्कार , धूल की तरह
नए-नए तजुर्बे अब , सिखलाती तितलियाँ  

टूट जातें हैं पलों में , बांध सब्र के   
सोये हुए अरमान है , जगाती तितलियाँ

आँखों से मिलती आँखें , बातों से मिलती बातें
पर दिल से दिल कभी ना , मिलाती तितलियाँ

वो दूर हुए जा रहें हैं , अपनें अपनों से
क्योंकि ज्यादा प्यार है , जताती तितलियाँ   

माँ-बाप सफलता की , चाहत में मर रहें
बेटे को असफलता की , लत लगाती तितलियाँ      

उसको नहीं पसंद , जमानें की उलझनें
लगती है बुरी दुनियां , बस भाती तितलियाँ

बढ़ती गई नजदीकियां , मिटता गया भरम             
आँखों से शरम लाज , है हटाती तितलियाँ

जब तक हो भरा जेब , बनी दोस्ती रहें          
फक्करों से अपना साथ , है छुड़ाती तितलियाँ

ये मौज मस्ती के लिए , करती हैं यारियां
और नाम दोस्ती का , है बताती तितलियाँ

जीता है इनसे वो ही , इच्छा दृढ रही जिनकी
बचना की हर मोड़ पे , बहकाती तितलियाँ

January 2, 2011

दो हजार ग्यारह

नये सवेरे को लेकर , देखो सूरज आया है
उम्मींदों के पर पाके , हर शै मुस्काया है

नए-नए  सपने  जागे  हैं , आशाओं  के  भूपर                                        
सिहरन सी होती है मन में ,अरमानों को छूकर

भरे कुलांचे मन का पंछी , गाने लगा तराने
एकत्रित कर शक्ति सारी , उड़ने लगा उड़ाने   

झरने  लगे  हैं  पीले  पत्ते , नव  पल्लव  है  आया
काँटों के साये से निकलकर , कली-कली मुस्काया

नई  उमंगों  नई  तरंगों , ने  पर  फैलाया  है
दो हजार खुशियों के पल , लेकर ग्यारह आया है

शुभकामनाएं

नए साल में सब नई बात हों ,
                                      खिले से हो दिन और हँसी रात हों
बादल ग़मों के न मंडराने पाए ,
                                      हर रोज खुशियों की बरसात हो
ख्वाहिश रही जो अधूरी,हो पूरी,
                                      आनेवाला पल एक सौगात हो
न जंग न बैर न हो दुश्मनी  ,
                                     बस दोस्त की दोस्ती साथ हो
अरमां सजे सारे गुलशन के जैसे,
                                     मीठे से हर एक जज्बात हो
मिलते रहे हाथ से हाथ अब तक,
                                      मिले दिल से दिल वो मुलाकात हो

दस्तक

अभी खुलके इनसे मिल भी न पाए , की ये जा चुके हैं और वो आ गया है
जुदाई का दिल गम माना भी न पाया , घटा बन गगन में खुशी छा गया है

ये माना कि सच्चे हैं इनके हर वादे , बड़े  नेक  लेकर  हैं  आये  इरादे 
मगर हम भी इतने बेमरौवत नहीं हैं , ऐसे ही यूहीं किसी को भुलादे

इन्हें है पता हर इक आंसुओं का , ये है गवाह सारे खुशियों के पल का
बीते हुए पल सुलझ भी न पाए , सजाएँ स्वप्न कैसे आने वाले कल का

मगर है यही इस जहाँ कि बनावट , होता रहा यूहीं सदियों से अबतक
खिसक जाता चुपके से वर्ष पहला  , नया शाल धीरे से देता है दस्तक

December 25, 2010

बड़ा दिन

सुनो दोस्तों इक नई सी खबर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है
खोया - खोया सा अब शामो सहर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है

मोटी परत ठंढ की है आने वाली, कोहरा फ़ज़ाओं में है छानेवाली
जो भी है ये सब शरद का असर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है

 सर्द हवाओं के झोंके चलेंगे , अब तेल से दादा तलबे मलेंगे
दादी हमारी कहेगी कहर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है

पहनने पड़ेंगे अब स्वेटर पर स्वेटर , बैठेगी मम्मी कांटा-ऊन लेकर
इसी काम में बितनी दो पहर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है

अब हर जगह पर जलेंगी अलावें , किये जायेंगे कई तरह के उपाएँ
मानव तो मानव पशुओं को भी डर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है

कहने को तो कहते हैं ठण्ड सजा है , मगर इसका अपना अलग ही मज़ा है
अब देर तक सोने का अवसर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है

चाय और कॉफ़ी की चुस्की लगते, चद्दर लिहाफो में छुपते छुपाते
सबकी नज़र होनी आराम पर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है

December 22, 2010

दावत

है पलेटें हाथ में , दोस्तों के साथ में
                 लग रहीं कतार है , दावतों की बहार है

भुख्खरों की भीड़ है पा ले  जो वो वीर  है
                  पाने की तकरार है, दावतों की बहार है

सामने पकवान है , होठों पे मुस्कान है
                    पेट की पुकार है , दावतों की बहार है

खाना है या खेल है , लोग ठेलमठेल है
                    चम्मचों पे भी मार है , दावतों की बहार है

दोस्त दुश्मन लग राहे , शैतान मन के जग रहें
                     सब बने खूंखार है, दावतों की बहार है

सूट  टाई बूट में , सब लगे हैं लूट में
                     ये अजब व्यवहार है, दावतों की बहार है

मिठाइयाँ है रस भरी पनीर प्लेटों में भरी
                    टपका राही ये लार है, दावतों की बहार है

फास्ट फ़ूड की ठाठ है , गोल - गप्पे चाट है
                    बनी सलाद श्रींगार है , दावतों की बहार है

तरह- तरह की डिस सजी , चिक्केन - मटन , फिश सजी
                  हॉट सूप भी तैयार है , दावतों की बहार है

चाय - कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक्स , प्यास बढाती आईस - क्रीम्स
                   खट्टी-खट्टी डकार है, दावतों की बहार है
                   

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