सुनो दोस्तों इक नई सी खबर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है
खोया - खोया सा अब शामो सहर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है
मोटी परत ठंढ की है आने वाली, कोहरा फ़ज़ाओं में है छानेवाली
जो भी है ये सब शरद का असर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है
सर्द हवाओं के झोंके चलेंगे , अब तेल से दादा तलबे मलेंगे
दादी हमारी कहेगी कहर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है
पहनने पड़ेंगे अब स्वेटर पर स्वेटर , बैठेगी मम्मी कांटा-ऊन लेकर
इसी काम में बितनी दो पहर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है
अब हर जगह पर जलेंगी अलावें , किये जायेंगे कई तरह के उपाएँ
मानव तो मानव पशुओं को भी डर है, की आज से दिन बड़ा हो रहा है
कहने को तो कहते हैं ठण्ड सजा है , मगर इसका अपना अलग ही मज़ा है
अब देर तक सोने का अवसर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है
चाय और कॉफ़ी की चुस्की लगते, चद्दर लिहाफो में छुपते छुपाते
सबकी नज़र होनी आराम पर है , की आज से दिन बड़ा हो रहा है
नव भारती सेवा ट्रस्ट की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है महिलाओं का सशक्तिकरण। बदलते वक्त के साथ महिलाओं को भी अपनी परिधि का विस्तार करना होगा, यही समय की मांग है। समाज मे उपेक्षित रूप से जी रहीं महिलाओं को हम उनके ताक़त का भान कराकर उन्हें अपने सम्मानित रूप से जीने का अधिकार प्राप्त करने में सहायता प्रदान करते है|
December 25, 2010
December 22, 2010
दावत
है पलेटें हाथ में , दोस्तों के साथ में
लग रहीं कतार है , दावतों की बहार है
भुख्खरों की भीड़ है पा ले जो वो वीर है
पाने की तकरार है, दावतों की बहार है
सामने पकवान है , होठों पे मुस्कान है
पेट की पुकार है , दावतों की बहार है
खाना है या खेल है , लोग ठेलमठेल है
चम्मचों पे भी मार है , दावतों की बहार है
दोस्त दुश्मन लग राहे , शैतान मन के जग रहें
सब बने खूंखार है, दावतों की बहार है
सूट टाई बूट में , सब लगे हैं लूट में
ये अजब व्यवहार है, दावतों की बहार है
मिठाइयाँ है रस भरी पनीर प्लेटों में भरी
टपका राही ये लार है, दावतों की बहार है
फास्ट फ़ूड की ठाठ है , गोल - गप्पे चाट है
बनी सलाद श्रींगार है , दावतों की बहार है
तरह- तरह की डिस सजी , चिक्केन - मटन , फिश सजी
हॉट सूप भी तैयार है , दावतों की बहार है
चाय - कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक्स , प्यास बढाती आईस - क्रीम्स
खट्टी-खट्टी डकार है, दावतों की बहार है
लग रहीं कतार है , दावतों की बहार है
भुख्खरों की भीड़ है पा ले जो वो वीर है
पाने की तकरार है, दावतों की बहार है
सामने पकवान है , होठों पे मुस्कान है
पेट की पुकार है , दावतों की बहार है
खाना है या खेल है , लोग ठेलमठेल है
चम्मचों पे भी मार है , दावतों की बहार है
दोस्त दुश्मन लग राहे , शैतान मन के जग रहें
सब बने खूंखार है, दावतों की बहार है
सूट टाई बूट में , सब लगे हैं लूट में
ये अजब व्यवहार है, दावतों की बहार है
मिठाइयाँ है रस भरी पनीर प्लेटों में भरी
टपका राही ये लार है, दावतों की बहार है
फास्ट फ़ूड की ठाठ है , गोल - गप्पे चाट है
बनी सलाद श्रींगार है , दावतों की बहार है
तरह- तरह की डिस सजी , चिक्केन - मटन , फिश सजी
हॉट सूप भी तैयार है , दावतों की बहार है
चाय - कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक्स , प्यास बढाती आईस - क्रीम्स
खट्टी-खट्टी डकार है, दावतों की बहार है
December 18, 2010
किताबों की दुनियां
बड़ी ही हँसी मैं किताबों की दुनियां , सभी रंग खुद में समाए हुए हूँ
जुबां से नहीं जो कही जा सकी है , कई राज ऐसे छुपाये हुए हूँ
पोरस से लेकर सिकंदर की बाते , बाहर की बाते या अंदर की बातें
बड़े शौख से अपने पन्नों के नीचे , हर इक हकीकत दबाए हुए हूँ
राजा रानी और सिंहासन के झगड़े , प्रजा भुखमरी और राशन के झगड़े ,
खुशी में भी मैंने मनाई है खुशियाँ , और गम में आंसू बहाए हुए हूँ
माना की कहती है नानी कहानी , मैं रखती हूँ उससे पुरानी कहानी
सदियों पुरानी ख्यालों से आगे , तिलस्मी एय्यारी सुनाए हुए हूँ
मानव के मन की तहें मैंने खोली , नही जो वो बोला वो बातें भी बोली
क्या सोंचता है कोई अपने दिल में , वो जज्बात भी मैं बताए हुए हूँ
लैला और मजनूं के वादे और कसमें , तोड़ी जो हीर और राँझा ने रस्में
जमाने के संग-संग मै भी जली हूँ , और प्यार उनका जलाए हुए हूँ
वेदों - पुरानों और ग्रंथों की ढेरी , संतों और गुनियों की बातें बहुतेरी
रंगे - बिरंगे अनोखे - अजूबे , कई चित्र खुद पे बनाए हुए हूँ
मैंने समेटे हैं हर ज्ञान खुद में , गृह ज्ञान से लेके विज्ञान खुद में
लाखों हजारो को मैं अपने दम पे , सफलताओं का रस चखाए हुए हूँ
बिगरे सहजादो को मैंने संवारा , पतितो को पावन बनाके उबारा
माने ना माने जमाना ये बातें , कई बार दम मैं दिखाए हुए हूँ
मैं हूँ कलाओं को कब से संजोये , सुर ताल लय को हूँ खुद में पिरोये
नहीं दे सकी साथ जिनका ये दुनिया , मैं साथ उनका निभाए हुए हूँ
खोते रहे कई दिन रैन मुझमें , पाते रहे सब सुख चैन मुझमें
हारे हुए को भी देके दिलासा , आँखों में तारे चमकाए हुए हूँ
मगर अब जमाना बदलने लगा हैं, कई और के रंग में ढलने लगा हैं
कभी ना कभी लौटेंगे मेरे अपने , मैं आस अब भी लगाये हुए हूँ
जुबां से नहीं जो कही जा सकी है , कई राज ऐसे छुपाये हुए हूँ
पोरस से लेकर सिकंदर की बाते , बाहर की बाते या अंदर की बातें
बड़े शौख से अपने पन्नों के नीचे , हर इक हकीकत दबाए हुए हूँ
राजा रानी और सिंहासन के झगड़े , प्रजा भुखमरी और राशन के झगड़े ,
खुशी में भी मैंने मनाई है खुशियाँ , और गम में आंसू बहाए हुए हूँ
माना की कहती है नानी कहानी , मैं रखती हूँ उससे पुरानी कहानी
सदियों पुरानी ख्यालों से आगे , तिलस्मी एय्यारी सुनाए हुए हूँ
मानव के मन की तहें मैंने खोली , नही जो वो बोला वो बातें भी बोली
क्या सोंचता है कोई अपने दिल में , वो जज्बात भी मैं बताए हुए हूँ
लैला और मजनूं के वादे और कसमें , तोड़ी जो हीर और राँझा ने रस्में
जमाने के संग-संग मै भी जली हूँ , और प्यार उनका जलाए हुए हूँ
वेदों - पुरानों और ग्रंथों की ढेरी , संतों और गुनियों की बातें बहुतेरी
रंगे - बिरंगे अनोखे - अजूबे , कई चित्र खुद पे बनाए हुए हूँ
मैंने समेटे हैं हर ज्ञान खुद में , गृह ज्ञान से लेके विज्ञान खुद में
लाखों हजारो को मैं अपने दम पे , सफलताओं का रस चखाए हुए हूँ
बिगरे सहजादो को मैंने संवारा , पतितो को पावन बनाके उबारा
माने ना माने जमाना ये बातें , कई बार दम मैं दिखाए हुए हूँ
मैं हूँ कलाओं को कब से संजोये , सुर ताल लय को हूँ खुद में पिरोये
नहीं दे सकी साथ जिनका ये दुनिया , मैं साथ उनका निभाए हुए हूँ
खोते रहे कई दिन रैन मुझमें , पाते रहे सब सुख चैन मुझमें
हारे हुए को भी देके दिलासा , आँखों में तारे चमकाए हुए हूँ
मगर अब जमाना बदलने लगा हैं, कई और के रंग में ढलने लगा हैं
कभी ना कभी लौटेंगे मेरे अपने , मैं आस अब भी लगाये हुए हूँ
December 8, 2010
आलसीनामा
दिन रात करूँ सुबह शाम करूँ , जब जी चाहे आराम करूँ
बीते ऐसे ही अब जीवन , जी करता ना कोई काम करूँ
ये भाग दौड़ है क्यूँ करना , इस उलझन में है क्यूँ पड़ना
इन जोड़-तोड़ से क्या होगा , आखिर तो इक दिन है मरना
जाने सब क्यूँ बेचैन रहे , सपनों में खोये नैन रहे
ये जीना भी कोई जीना है , ना नींद रहे ना चैन रहे
जो होना है वो होता है , कोई पाता है कोई खोता है
कोई पत्थर से सर फोड़ रहा , कोई तान के चादर सोता है
दुनिया मारे हमको ताने , आये हमे अपनी समझाने
पर पक्के हम अपनी धुन के , हम तो अपनी मन की माने
जो होता है वो हो बेकल , हमको न गंवाने है ये पल
हम आज में जीने वाले हैं , देखेंगे जो होना हो कल
है अपने लिए हरपल हरक्षण , है ऐसो आराम भरा जीवन
परवाह नहीं करनी हमको , चाहे कहे जहाँ इसे आलसपन
बीते ऐसे ही अब जीवन , जी करता ना कोई काम करूँ
ये भाग दौड़ है क्यूँ करना , इस उलझन में है क्यूँ पड़ना
इन जोड़-तोड़ से क्या होगा , आखिर तो इक दिन है मरना
जाने सब क्यूँ बेचैन रहे , सपनों में खोये नैन रहे
ये जीना भी कोई जीना है , ना नींद रहे ना चैन रहे
जो होना है वो होता है , कोई पाता है कोई खोता है
कोई पत्थर से सर फोड़ रहा , कोई तान के चादर सोता है
दुनिया मारे हमको ताने , आये हमे अपनी समझाने
पर पक्के हम अपनी धुन के , हम तो अपनी मन की माने
जो होता है वो हो बेकल , हमको न गंवाने है ये पल
हम आज में जीने वाले हैं , देखेंगे जो होना हो कल
है अपने लिए हरपल हरक्षण , है ऐसो आराम भरा जीवन
परवाह नहीं करनी हमको , चाहे कहे जहाँ इसे आलसपन
November 28, 2010
जिन्दगी
तेरी जिन्दगी हो या हो मेरी जिन्दगी
दिखती है सरल होती है पर टेढ़ी जिन्दगी
सुलझा सका न कोई जिन्दगी का फलसफा
है उलझनों मुसीबतों की ढेरी जिन्दगी
हर रोज सिखाती है नये ढंग जिन्दगी,
चलती है सुख और दुःख के संग जिन्दगी
कहने को है जहाँ में कई जानकार पर ,
ना जाने कोई कब बदल ले रंग जिन्दगी
देती है जिन्दगी में कई नाम जिन्दगी ,
कई खास तो होती है कई आम जिन्दगी
बढती है जितनी उतनी ही घटती है पलपल
ऐसे ही हुई जाती है तमाम जिन्दगी
कभी दर्द कभी गम है कभी प्यार जिन्दगी ,
कभी जीत मयस्सर तो कभी हार जिन्दगी
हर एक जिन्दगी का है वजूद जहाँ में ,
होती नही कभी कोई बेकार जिन्दगी
ना जाने किसने कब कहाँ बनाई जिन्दगी ,
पा के भी ना ये जाना कि कब पाई जिन्दगी
जितना भी जिए जीने कि चाहत नही गई ,
कुछ और कि उम्मीद पे ललचाई जिन्दगी
है तंगहाल सी हुई हर एक जिन्दगी ,
लगती है सदा दूसरों कि नेक जिन्दगी
कहने को तो इन्सान बड़ा खुशमिजाज है
जलता है मगर दूसरों कि देख जिन्दगी
देती है साथ उम्रभर है मीत जिन्दगी ,
गाए अगर इसे तो बने गीत जिन्दगी
है सोचना हमें कि जिए इसको किस तरह ,
हर मोड़ पे सिखलाती नई रीत जिन्दगी
लाती है कैसे - कैसे अजब मोड़ जिन्दगी ,
देती है हौसलों को कभी तोड़ जिन्दगी
हम जिन्दगी का साथ देते रहें सदा ,
देती है एक दिन साथ छोड़ जिन्दगी
दिखती है सरल होती है पर टेढ़ी जिन्दगी
सुलझा सका न कोई जिन्दगी का फलसफा
है उलझनों मुसीबतों की ढेरी जिन्दगी
हर रोज सिखाती है नये ढंग जिन्दगी,
चलती है सुख और दुःख के संग जिन्दगी
कहने को है जहाँ में कई जानकार पर ,
ना जाने कोई कब बदल ले रंग जिन्दगी
देती है जिन्दगी में कई नाम जिन्दगी ,
कई खास तो होती है कई आम जिन्दगी
बढती है जितनी उतनी ही घटती है पलपल
ऐसे ही हुई जाती है तमाम जिन्दगी
कभी दर्द कभी गम है कभी प्यार जिन्दगी ,
कभी जीत मयस्सर तो कभी हार जिन्दगी
हर एक जिन्दगी का है वजूद जहाँ में ,
होती नही कभी कोई बेकार जिन्दगी
ना जाने किसने कब कहाँ बनाई जिन्दगी ,
पा के भी ना ये जाना कि कब पाई जिन्दगी
जितना भी जिए जीने कि चाहत नही गई ,
कुछ और कि उम्मीद पे ललचाई जिन्दगी
है तंगहाल सी हुई हर एक जिन्दगी ,
लगती है सदा दूसरों कि नेक जिन्दगी
कहने को तो इन्सान बड़ा खुशमिजाज है
जलता है मगर दूसरों कि देख जिन्दगी
देती है साथ उम्रभर है मीत जिन्दगी ,
गाए अगर इसे तो बने गीत जिन्दगी
है सोचना हमें कि जिए इसको किस तरह ,
हर मोड़ पे सिखलाती नई रीत जिन्दगी
लाती है कैसे - कैसे अजब मोड़ जिन्दगी ,
देती है हौसलों को कभी तोड़ जिन्दगी
हम जिन्दगी का साथ देते रहें सदा ,
देती है एक दिन साथ छोड़ जिन्दगी
October 28, 2010
आँखें
कुछ काली सी कुछ भूरी सी , कुछ होती हैं नीली आँखें
कुछ आघातों से सुनी सी , कुछ हर्षित चमकीली आँखें
कई उभरी सी और बड़ी-बड़ी , कई धंसी हुई डूबी आँखें
कई राग-रंग में फँसी हुई , कुछ तंगहाल उबी आँखें
पलकों के नीचे छुपी हुई , दुनिया को दिखलाती आँखें
कुछ डरी-डरी सी सहमी सी , बचपन की घबराती आँखें
कुछ पाने पे कुछ खोने पे , हो जाती है गीली आँखें
यौवन का आना और होना , सपनों से रंगीली आँखें
बिछुडों से मिलने का वो सुख , खुशियों से भरी खिली आँखें
गिरती उठती मिलती छुपती , दुल्हन की शर्मीली आँखें
कभी हार जीत में फँसी हुई , बेसब्री में उलझी आँखे
कई आशा और निराशा में , बोझिल सी बुझी-बुझी आँखे
वो इंतजार में अपनों की , इकटक राहें तकती आँखें
हो सूनापन और तन्हाई , और रातों को जगती आँखे
यादों में अपने सजना की , सजनी की है खोई आँखें
है राज ये लाली खोल रही , की रातों को रोई आँखें
वो लाचारी और झुरियों में , अंतिम घड़ियाँ गिनती आँखें
बीते लम्हों के साये से , कुछ प्यारे पल बिनती आँखें
है नूर भी ये मगरूर भी ये , है नाज भरी कातिल आँखें
लाखों पहरों के आगे भी , लेती - देती है दिल आँखें
जो बोल नहीं पाते ये लब , वो बातें भी कहती आँखें
सब भूल भी जाये कोई पर , है याद सदा रहती आँखें
कुछ आघातों से सुनी सी , कुछ हर्षित चमकीली आँखें
कई उभरी सी और बड़ी-बड़ी , कई धंसी हुई डूबी आँखें
कई राग-रंग में फँसी हुई , कुछ तंगहाल उबी आँखें
पलकों के नीचे छुपी हुई , दुनिया को दिखलाती आँखें
कुछ डरी-डरी सी सहमी सी , बचपन की घबराती आँखें
कुछ पाने पे कुछ खोने पे , हो जाती है गीली आँखें
यौवन का आना और होना , सपनों से रंगीली आँखें
बिछुडों से मिलने का वो सुख , खुशियों से भरी खिली आँखें
गिरती उठती मिलती छुपती , दुल्हन की शर्मीली आँखें
कभी हार जीत में फँसी हुई , बेसब्री में उलझी आँखे
कई आशा और निराशा में , बोझिल सी बुझी-बुझी आँखे
वो इंतजार में अपनों की , इकटक राहें तकती आँखें
हो सूनापन और तन्हाई , और रातों को जगती आँखे
यादों में अपने सजना की , सजनी की है खोई आँखें
है राज ये लाली खोल रही , की रातों को रोई आँखें
वो लाचारी और झुरियों में , अंतिम घड़ियाँ गिनती आँखें
बीते लम्हों के साये से , कुछ प्यारे पल बिनती आँखें
है नूर भी ये मगरूर भी ये , है नाज भरी कातिल आँखें
लाखों पहरों के आगे भी , लेती - देती है दिल आँखें
जो बोल नहीं पाते ये लब , वो बातें भी कहती आँखें
सब भूल भी जाये कोई पर , है याद सदा रहती आँखें
October 26, 2010
कहाँ है
वो चैन इत्मिनान और सुकून कहाँ है
जो चाहिए जीने को वो जूनून कहाँ है
ना जाने कहाँ हो गये शिकस्त हौसले
जो खौलता था बेधरक वो खून कहाँ है
सच के लिए उठने को अब आवाज कहाँ है
वो स्वाभिमान देशभक्ति नाज कहाँ है
है अपने - अपने गम से यहाँ त्रस्त हर कोई
गमगीं है जहाँ कोई खुश मिजाज कहाँ है
बादल को अब बूंदों पे इख़्तियार कहाँ है
सागर को भी लहरों पे ऐतवार कहाँ है
हार शै नशीब है हुआ ऐशो आराम का
पर दिल को एक पल को भी करार कहाँ है
ऊँगली उठी कई बार की भगवान कहाँ है
वो सच्ची और प्यारी सी मुस्कान कहाँ है
झाँका नही कभी भी गिरेबान में अपने
जो प् सके रब को तू वो इन्सान कहाँ है
जो चाहिए जीने को वो जूनून कहाँ है
ना जाने कहाँ हो गये शिकस्त हौसले
जो खौलता था बेधरक वो खून कहाँ है
सच के लिए उठने को अब आवाज कहाँ है
वो स्वाभिमान देशभक्ति नाज कहाँ है
है अपने - अपने गम से यहाँ त्रस्त हर कोई
गमगीं है जहाँ कोई खुश मिजाज कहाँ है
बादल को अब बूंदों पे इख़्तियार कहाँ है
सागर को भी लहरों पे ऐतवार कहाँ है
हार शै नशीब है हुआ ऐशो आराम का
पर दिल को एक पल को भी करार कहाँ है
ऊँगली उठी कई बार की भगवान कहाँ है
वो सच्ची और प्यारी सी मुस्कान कहाँ है
झाँका नही कभी भी गिरेबान में अपने
जो प् सके रब को तू वो इन्सान कहाँ है
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