बनते बिगड़ते बवालों में , नेताओं के चालों में
दुनिया भर के सवालों में , दिल्ली फँसी घोटालों में
कॉमनवेल्थ की आड़ में , कॉंग्रेस की सरकार में
कलमाडी की वार में , दिल्ली दबी बेकार में
खेलों की तैयारी में , वक्त की मारामारी में
लालच की बीमारी में , दिल्ली गई लाचारी में
भारत माँ के आनों पे , मक्कारी भरे बहनों पे
ताले लगे जुबानों पे , दिल्ली के मुस्कानों पे
जनता थी भोलेपन में , मैल भरा उनके मन में
लगे खेलने वो धन में , दिल्ली के ही आँगन में
अरबों में और खरबों में , नेताओं के तलबों में
रंग – बिरंगे जलबो में , दिल्ली खरी है मलबों में
आँखों में आंसू भरके , कितनों को बेघर कर के
खेला किये वो बढ़ – बढ़ के, दिल्ली चुप हुई डरके
रही खबर बस कानों में , हँसते गाते मेहमानों में
टेबल – कुर्सी खानों में , दिल्ली सजी दुकानों में
झूट दबे सच बोला जाये, देशभक्ति रस घोला जाये
बेईमानों को तोला जाये , दिल्ली अब मुँह खोला जाये
नव भारती सेवा ट्रस्ट की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है महिलाओं का सशक्तिकरण। बदलते वक्त के साथ महिलाओं को भी अपनी परिधि का विस्तार करना होगा, यही समय की मांग है। समाज मे उपेक्षित रूप से जी रहीं महिलाओं को हम उनके ताक़त का भान कराकर उन्हें अपने सम्मानित रूप से जीने का अधिकार प्राप्त करने में सहायता प्रदान करते है|
October 22, 2010
October 20, 2010
बचपन
ऐ काश की फिर लौटा पाते , जो बीत गया है वो जीवन
कितना प्यारा कितना सुंदर , कितना न्यारा था वो बचपन
वो गलियाँ और वो चौराहा , चलना पगडंडी मेड़ों पे
अमरुद लीची या आम लदे , वो चढना उतरना पेड़ों पे
वो विद्यालय जिसमें हमने , का-का की-की पढना सिखा
वो इंक दवात की स्याही से , जीवन में रंग भरना सिखा
कभी खेल-खेल के चक्कर में , अपनी कुछ चीजे खो देना
खुद से ही गलती करना , और मार के डर से रो देना
गिल्ली-डंडे और कंचों में , खाने की सुध बुध ना रहना
सुनकर भी अनसुनी करना , अपनी अम्मा का हर कहना
वो हार पे अपनी चिल्लाना , और जीत पे अपनी इतराना
इक-इक दावों पे दम भरना , हर एक चाल पे मुस्काना
लेते ही किताबें हाथों में , निंदिया रानी का आ जाना
घंटों तक बाबू जी का फिर , वो ज्ञान की महिमा समझाना
लोभ में पड़के मिठाई की , अपने घर में चोरी करना
पूछे जाने पर चुप रहना , और गालों पर थप्पड़ का पड़ना
आवाज दोस्तों की सुनकर , वो खड़ा कान का हो जाना
घर में चुपके-चुपके चलना , फिर दौड़ गली में खो जाना
छुपके दादा के चश्मे से , वो देखना दुनिया बड़ी-बड़ी
दिन त्योहारों पकवानों का , और भूख का लगना घड़ी-घड़ी
आना घर पे मेहमानों का , कुछ पाने को जी ललचाना
फिर छोड़ के नटखटपन अपना , भोला-भाला सा बन जाना
वो हाथ पकड़ के भैया का , हर रोज बजारों में जाना
हर चीज देखकर जिद करना , और बात पे अपनी अड़ जाना
चढके चाचा के कन्धों पे , उनकी मुछों को सहलाना
कह-कह के कहानी परियों की , दीदी का दिल को बहलाना
वो रेत में पांव घुसाकर के , इक सुंदर महल बना लेना
इक नाव बनाना बारिश में , और मार के डंडा चला लेना
घनघोर घटा के छाने पर , वो होके मगन नांचा करना
तूफां में करना कूद -फांद , और आँख में मिटटी का भरना
कच्चे अमिया का खट्टापन , और पानी मुंह में आ जाना
फिरना दिन-दिन भर बागों में , और विद्यालय में ना जाना
वो कान पकड़ मुर्गा बनना , घंटों उठक - बैठक करना
पलभर करना अफसोस मगर , घंटों तक आंसू का झरना
संगी - साथी और हमजोली , रगडा - झगडा गुस्सा अनबन
खट्टी - मिट्ठी बातों वाली , कई यादे छोड़ गया बचपन
कितना प्यारा कितना सुंदर , कितना न्यारा था वो बचपन
वो गलियाँ और वो चौराहा , चलना पगडंडी मेड़ों पे
अमरुद लीची या आम लदे , वो चढना उतरना पेड़ों पे
वो विद्यालय जिसमें हमने , का-का की-की पढना सिखा
वो इंक दवात की स्याही से , जीवन में रंग भरना सिखा
कभी खेल-खेल के चक्कर में , अपनी कुछ चीजे खो देना
खुद से ही गलती करना , और मार के डर से रो देना
गिल्ली-डंडे और कंचों में , खाने की सुध बुध ना रहना
सुनकर भी अनसुनी करना , अपनी अम्मा का हर कहना
वो हार पे अपनी चिल्लाना , और जीत पे अपनी इतराना
इक-इक दावों पे दम भरना , हर एक चाल पे मुस्काना
लेते ही किताबें हाथों में , निंदिया रानी का आ जाना
घंटों तक बाबू जी का फिर , वो ज्ञान की महिमा समझाना
लोभ में पड़के मिठाई की , अपने घर में चोरी करना
पूछे जाने पर चुप रहना , और गालों पर थप्पड़ का पड़ना
आवाज दोस्तों की सुनकर , वो खड़ा कान का हो जाना
घर में चुपके-चुपके चलना , फिर दौड़ गली में खो जाना
छुपके दादा के चश्मे से , वो देखना दुनिया बड़ी-बड़ी
दिन त्योहारों पकवानों का , और भूख का लगना घड़ी-घड़ी
आना घर पे मेहमानों का , कुछ पाने को जी ललचाना
फिर छोड़ के नटखटपन अपना , भोला-भाला सा बन जाना
वो हाथ पकड़ के भैया का , हर रोज बजारों में जाना
हर चीज देखकर जिद करना , और बात पे अपनी अड़ जाना
चढके चाचा के कन्धों पे , उनकी मुछों को सहलाना
कह-कह के कहानी परियों की , दीदी का दिल को बहलाना
वो रेत में पांव घुसाकर के , इक सुंदर महल बना लेना
इक नाव बनाना बारिश में , और मार के डंडा चला लेना
घनघोर घटा के छाने पर , वो होके मगन नांचा करना
तूफां में करना कूद -फांद , और आँख में मिटटी का भरना
कच्चे अमिया का खट्टापन , और पानी मुंह में आ जाना
फिरना दिन-दिन भर बागों में , और विद्यालय में ना जाना
वो कान पकड़ मुर्गा बनना , घंटों उठक - बैठक करना
पलभर करना अफसोस मगर , घंटों तक आंसू का झरना
संगी - साथी और हमजोली , रगडा - झगडा गुस्सा अनबन
खट्टी - मिट्ठी बातों वाली , कई यादे छोड़ गया बचपन
October 18, 2010
अस्तित्व
देकर इक पिंजरा सोने का , उड़ान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
टकराकर रोज किनारों से , लहरों ने रोना सीख लिया
जख्मों का पीब बना जैसे , आंसूं से धोना सीख लिया
इक आह की लौ जो जलती थी ,वो वक्त के आगे नही टिकी
इक खुशी कभी जो दिखती थी , ना जाने फिर क्यूँ नही दिखी
इस डर से ना मुस्काए की , मुस्कान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
पिसते जीवन की चक्की में , तपतें चूल्हों की भट्टी में
दुनिया की खातिरदारी में , अब रक्त बचा ना पुट्ठी में
गम खा-खा कर भी गुमसुम है , आंसू पी के भी मौन हैं ये
है शब्द मगर निः शब्द खड़े , ना जाने भी की कौन हैं ये
कभी बेटी कभी बहु कहकर , पहचान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
मेरे भी सपने फूटेंगे , अंकुर का ऐसा दावा है
धीरे - धीरे चिंगारी को , बनना ही इकदिन लावा है
इक हाहाकार उठेगी जब , तब तुंफा और प्रलय होगा
फिर से इस सारी सृष्टि पर , ममता और प्यार का जय होगा
टूटी - फूटी - झूटी ही सहीं , अरमान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
टकराकर रोज किनारों से , लहरों ने रोना सीख लिया
जख्मों का पीब बना जैसे , आंसूं से धोना सीख लिया
इक आह की लौ जो जलती थी ,वो वक्त के आगे नही टिकी
इक खुशी कभी जो दिखती थी , ना जाने फिर क्यूँ नही दिखी
इस डर से ना मुस्काए की , मुस्कान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
पिसते जीवन की चक्की में , तपतें चूल्हों की भट्टी में
दुनिया की खातिरदारी में , अब रक्त बचा ना पुट्ठी में
गम खा-खा कर भी गुमसुम है , आंसू पी के भी मौन हैं ये
है शब्द मगर निः शब्द खड़े , ना जाने भी की कौन हैं ये
कभी बेटी कभी बहु कहकर , पहचान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
मेरे भी सपने फूटेंगे , अंकुर का ऐसा दावा है
धीरे - धीरे चिंगारी को , बनना ही इकदिन लावा है
इक हाहाकार उठेगी जब , तब तुंफा और प्रलय होगा
फिर से इस सारी सृष्टि पर , ममता और प्यार का जय होगा
टूटी - फूटी - झूटी ही सहीं , अरमान छिन लेती दुनिया
आवाज उठाने से पहले , जुबान छिन लेती दुनिया
October 11, 2010
जमाना बुरा है
मैं भी भली हूँ और तू भी भला है , फिर क्यूँ कह रहे हो जमाना बुरा है
जो हम तुम निभाते रहे कसमें -वादे , क्यों हो बेवफाई ये धोखा कहाँ है
जमाने को मुजरिम कहे जा रहे हो , जमाना तो हमसे और तुमसे बना है
हम में से ही कोई गद्दार होगा , जमाना बेचारा बेवजह पीस रहा है
बुरे पे अच्छाई का पानी चढ़ाके , दमकता चमकता हर इक चेहरा है
मिलावट की इतनी बुरी लत पड़ी है , है ईमान कम ज्यादा धोखा भरा है
छुपाते रहे अपनी कमजोरियां हम , जमाने को हम ने बुरा कह दिया है
हमें है पता वो न शिकवा करेगा , तभी नाम बदनाम उसका किया है
जो झाँका किये एकदिन दिल के अंदर , तो देखा की भगवान सोया पड़ा है
जगाया बहुत उनको पर वो न जागे , हुई ये खबर की वो हमसे खफा है
ये पूछा जब हमने बताओ बस इतना , भला हमसे ऐसी हुई क्या खता है
वो कहने लगे पूजते तुम मुझे हो , मगर तुझमे आदत सब शैतान का है
बनाया है मैंने ही सबको जहाँ में , मगर सब मुझे ही बनाने लगा है
समझने लगा है बड़ा खुद को मुझसे , मेरी रहमतों को भुलाने लगा है
वाकिफ हूँ मैं तेरी हर एक नस से , नासमझ फिर भी मुझसे छुपाने लगा है
करता है कम और दिखता है ज्यादा , बहुत दूर मुझसे तू जाने लगा है
बदल अपनी आदत बना पाक दिलको , मिटा दे भरम वो जो तुझमें भरा है
संभलने का तू आज संकल्प करले , भुला दूंगा मैं भूल मेरा दिल बड़ा है
मतलब - परस्ती फरेबी में पड़ के , खुद को ही धोखा दिए जा रहा है
बुराई को अपनी मिटाता नहीं है , कहता है सबको जमाना बुरा है
जो हम तुम निभाते रहे कसमें -वादे , क्यों हो बेवफाई ये धोखा कहाँ है
जमाने को मुजरिम कहे जा रहे हो , जमाना तो हमसे और तुमसे बना है
हम में से ही कोई गद्दार होगा , जमाना बेचारा बेवजह पीस रहा है
बुरे पे अच्छाई का पानी चढ़ाके , दमकता चमकता हर इक चेहरा है
मिलावट की इतनी बुरी लत पड़ी है , है ईमान कम ज्यादा धोखा भरा है
छुपाते रहे अपनी कमजोरियां हम , जमाने को हम ने बुरा कह दिया है
हमें है पता वो न शिकवा करेगा , तभी नाम बदनाम उसका किया है
जो झाँका किये एकदिन दिल के अंदर , तो देखा की भगवान सोया पड़ा है
जगाया बहुत उनको पर वो न जागे , हुई ये खबर की वो हमसे खफा है
ये पूछा जब हमने बताओ बस इतना , भला हमसे ऐसी हुई क्या खता है
वो कहने लगे पूजते तुम मुझे हो , मगर तुझमे आदत सब शैतान का है
बनाया है मैंने ही सबको जहाँ में , मगर सब मुझे ही बनाने लगा है
समझने लगा है बड़ा खुद को मुझसे , मेरी रहमतों को भुलाने लगा है
वाकिफ हूँ मैं तेरी हर एक नस से , नासमझ फिर भी मुझसे छुपाने लगा है
करता है कम और दिखता है ज्यादा , बहुत दूर मुझसे तू जाने लगा है
बदल अपनी आदत बना पाक दिलको , मिटा दे भरम वो जो तुझमें भरा है
संभलने का तू आज संकल्प करले , भुला दूंगा मैं भूल मेरा दिल बड़ा है
मतलब - परस्ती फरेबी में पड़ के , खुद को ही धोखा दिए जा रहा है
बुराई को अपनी मिटाता नहीं है , कहता है सबको जमाना बुरा है
October 10, 2010
गजल
अब तलक जो सपना रहा , काश वो सच होता सनम
उम्रभर को ना सहीं , पल दो पल के ही लिए
मैं तेरी जुल्फों के नीचे , चैन से सोता सनम
दिल में हूँ कब से दबाये , दर्द का इक जलजला
चाहूँ लग तेरे गले से , फुटकर रोता सनम
सोंचा था आबाद होंगे , हम तुम्हारे इश्क से
तुने सबकुछ ले लिया , पास मेरे जो था सनम
तू अगर लौटा जो देता , दिल मेरा बस एकबार
फिर कभी मैं राहेवफा में , दिल नहीं खोता सनम
कसमें वादे याद आते , तुझको भी जब बेपनाह
तू भी अपने पाप दिल के , आंसूओ से धोता सनम
मार के मेरी शख्सियत को , तू बना है बेगुनाह
फिर रहा हूँ दरबदर मैं , लाश को ढ़ोता सनम
उम्रभर को ना सहीं , पल दो पल के ही लिए
मैं तेरी जुल्फों के नीचे , चैन से सोता सनम
दिल में हूँ कब से दबाये , दर्द का इक जलजला
चाहूँ लग तेरे गले से , फुटकर रोता सनम
सोंचा था आबाद होंगे , हम तुम्हारे इश्क से
तुने सबकुछ ले लिया , पास मेरे जो था सनम
तू अगर लौटा जो देता , दिल मेरा बस एकबार
फिर कभी मैं राहेवफा में , दिल नहीं खोता सनम
कसमें वादे याद आते , तुझको भी जब बेपनाह
तू भी अपने पाप दिल के , आंसूओ से धोता सनम
मार के मेरी शख्सियत को , तू बना है बेगुनाह
फिर रहा हूँ दरबदर मैं , लाश को ढ़ोता सनम
October 9, 2010
दोस्ती
हैं मिलते रहे हाथ से हाथ अब तक ,
कभी दिल से दिल भी मिला करके देखो
नहीं गर मुहब्बत हो मुझसे ओ यारा ,
तो शिकवे शिकायत गिला करके देखो
है बनते हुए को तो सब ने बनाया ,
कभी काम बिगड़ा बना करके देखो
भागा करोगे तबाही से कब तक ,
कभी जश्ने गम भी मना करके देखो
दिलाउँ तुम्हें किस तरह मैं भरोसा ,
भरम अपने दिल का दफा करके देखो
अभी तक तो अपने लिए ही जिए तुम ,
कभी मेरी खातिर वफा करके देखो
मिलेंगे कभी तो किसी राह पर हम ,
हँसी सपने ऐसे सजा करके देखो
दफन है जो दिल में वो यादों का मौसम ,
जो तन्हा रहो तो जगा करके देखो
छोडो भी अब तुम बहाने बनाना ,
नहीं आ सको तो बुला करके देखो
खिलातें रहें फूल गमले में अब तक ,
कभी फूल दिल में खिला करके देखो
तुम्हें हो रही फिक्र क्यूँ बेवजह की ,
मेरी दोस्ती आजमां करके देखो
नहीं दिल्लगी है ये ओरों के जैसी ,
है सोना खड़ा ये तपा करके देखो
कभी दिल से दिल भी मिला करके देखो
नहीं गर मुहब्बत हो मुझसे ओ यारा ,
तो शिकवे शिकायत गिला करके देखो
है बनते हुए को तो सब ने बनाया ,
कभी काम बिगड़ा बना करके देखो
भागा करोगे तबाही से कब तक ,
कभी जश्ने गम भी मना करके देखो
दिलाउँ तुम्हें किस तरह मैं भरोसा ,
भरम अपने दिल का दफा करके देखो
अभी तक तो अपने लिए ही जिए तुम ,
कभी मेरी खातिर वफा करके देखो
मिलेंगे कभी तो किसी राह पर हम ,
हँसी सपने ऐसे सजा करके देखो
दफन है जो दिल में वो यादों का मौसम ,
जो तन्हा रहो तो जगा करके देखो
छोडो भी अब तुम बहाने बनाना ,
नहीं आ सको तो बुला करके देखो
खिलातें रहें फूल गमले में अब तक ,
कभी फूल दिल में खिला करके देखो
तुम्हें हो रही फिक्र क्यूँ बेवजह की ,
मेरी दोस्ती आजमां करके देखो
नहीं दिल्लगी है ये ओरों के जैसी ,
है सोना खड़ा ये तपा करके देखो
October 8, 2010
उलझन
मैं भी रोया तू भी रोई , पर रोने से क्या होता है
मैं तेरा हूँ तू मेरी है , जुदा होने से क्या होता हैं
है कौन भला इस दुनिया में , जिसको न कोई गम होता है
जाने से दूर सनम से भी , ये प्यार कहाँ कम होता है
जकड़े जाते हैं तन लेकिन , मन बांध कहाँ कोई पाता है
जब आँख देखती है सपने , मन का पंछी उड़ जाता है
दुनिया को नही मंजूर है ये , कोई प्यार भरा अफसाना हो
चाहे जितने भी हो दुश्मन , पर ना कोई दीवाना हो
मिलती हैं सजाएं उल्फत में , पत्थर बरसाए जाते हैं
ऐ यारा कर्ज मुहब्त में , ऐसे ही चुकाए जाते है
फिर उठेंगी ऊँची दिवारे , लाखों फतवे जारी होंगे
जिसे देख कयामत रोएगी , वो सितम ऐसे भारी होंगे
ममता देने वाली आँचल , बिल्कुल छोटी पर जायगी
खुशियाँ देने वाली आँखे , गम आँखों में भर जायगी
टूटेंगे जब दो दिल तबही, इस दुनिया को राहत होगी
महफिल में नफरतवालों के , फिर से रुसवा चाहत होगी
इस प्रेम डगर में दीवानी , इक मंजिल है दो राहें है
उस ओर जमाने की रौनक , इस ओर दर्द और आहें है
काँटों से भरे इन राहों पे , चल पाना बड़ा मुश्किल होगा
दम निकलेगा अरमानों का , छलनी-छलनी ये दिल होगा
ऐसा ना हो आगे बढके , फिर से पीछे मुडजाना हो
चलने से पहले सोंच जरा , ना की पीछे पछताना हो
अच्छा होगा तू सुलझाले ,अपनी उमीदों की उलझन
ऐसा ना हो तेरे कारण , जख्मी हो मेरा दिवानापन
ये सौदा दिलों का होता है , ये खेल बड़ा ही मुश्किल है
तेरे पास जमाने की दौलत , मेरे पास तो बस मेरा दिल है
हर गम दुनिया के सह लेगा , ये गम ना दिल सह पायेगा
मैं रोक न पाउंगा दिल को , दर्दे गम में बह जायगा
इस दम ही मुझको भूल के तू , कोई ढूंढ़ ले नये बहाने को
या तो दे वफाओं की रौनक , या मार दे फिर दीवाने को
क्या खोना है क्या पाना है , जो करना है इस दम कर ले
अपनाले या फिर ठुकरादे , अपनी उलझन को कम कर ले
मैं तेरा हूँ तू मेरी है , जुदा होने से क्या होता हैं
है कौन भला इस दुनिया में , जिसको न कोई गम होता है
जाने से दूर सनम से भी , ये प्यार कहाँ कम होता है
जकड़े जाते हैं तन लेकिन , मन बांध कहाँ कोई पाता है
जब आँख देखती है सपने , मन का पंछी उड़ जाता है
दुनिया को नही मंजूर है ये , कोई प्यार भरा अफसाना हो
चाहे जितने भी हो दुश्मन , पर ना कोई दीवाना हो
मिलती हैं सजाएं उल्फत में , पत्थर बरसाए जाते हैं
ऐ यारा कर्ज मुहब्त में , ऐसे ही चुकाए जाते है
फिर उठेंगी ऊँची दिवारे , लाखों फतवे जारी होंगे
जिसे देख कयामत रोएगी , वो सितम ऐसे भारी होंगे
ममता देने वाली आँचल , बिल्कुल छोटी पर जायगी
खुशियाँ देने वाली आँखे , गम आँखों में भर जायगी
टूटेंगे जब दो दिल तबही, इस दुनिया को राहत होगी
महफिल में नफरतवालों के , फिर से रुसवा चाहत होगी
इस प्रेम डगर में दीवानी , इक मंजिल है दो राहें है
उस ओर जमाने की रौनक , इस ओर दर्द और आहें है
काँटों से भरे इन राहों पे , चल पाना बड़ा मुश्किल होगा
दम निकलेगा अरमानों का , छलनी-छलनी ये दिल होगा
ऐसा ना हो आगे बढके , फिर से पीछे मुडजाना हो
चलने से पहले सोंच जरा , ना की पीछे पछताना हो
अच्छा होगा तू सुलझाले ,अपनी उमीदों की उलझन
ऐसा ना हो तेरे कारण , जख्मी हो मेरा दिवानापन
ये सौदा दिलों का होता है , ये खेल बड़ा ही मुश्किल है
तेरे पास जमाने की दौलत , मेरे पास तो बस मेरा दिल है
हर गम दुनिया के सह लेगा , ये गम ना दिल सह पायेगा
मैं रोक न पाउंगा दिल को , दर्दे गम में बह जायगा
इस दम ही मुझको भूल के तू , कोई ढूंढ़ ले नये बहाने को
या तो दे वफाओं की रौनक , या मार दे फिर दीवाने को
क्या खोना है क्या पाना है , जो करना है इस दम कर ले
अपनाले या फिर ठुकरादे , अपनी उलझन को कम कर ले
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