आंसू
नहीं बहते अब आँखों से
क्योंकी इसकी भाषा सबको पढनी नहीं आती
सच
अब बोलना हुआ मुश्किल
क्योंकि झूठ सबको पकड़नी नहीं आती
दर्द
दबाएँ हुए हैं दिलों में
क्योकि ये बात सबको बताई नहीं जाती
गम
दोस्त बना हैं जबसे
किसी और से यारी निभाई नहीं जाती
ख़ामोशी
पसंद हैं मुझे
क्योंकि ये बहुत कुछ कहा करती हैं
जिंदगी
क्यूँ है इतनी बेपरवाह
न चाहकर भी सबकुछ सहा करती हैं
नव भारती सेवा ट्रस्ट की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है महिलाओं का सशक्तिकरण। बदलते वक्त के साथ महिलाओं को भी अपनी परिधि का विस्तार करना होगा, यही समय की मांग है। समाज मे उपेक्षित रूप से जी रहीं महिलाओं को हम उनके ताक़त का भान कराकर उन्हें अपने सम्मानित रूप से जीने का अधिकार प्राप्त करने में सहायता प्रदान करते है|
October 4, 2010
कुछ अलग कुछ अनोखा

आओ करें कुछ अलग कुछ अनोखा
जिसमें भरा हो जोश उमंग
और हो जो जादू भरा
आओ चुने कुछ तिनके
चिड़ियों के जैसे
बनाएं इक घोंसला
आओ बटोरे कुछ पत्ते
लगायें इक अलाव
ठिठुरती ठंढ में
आओ चढ़ें पेड़ों पें
उन्हें हिलाएं डुलायें
और नीचे उतर आये
आओ बीच सड़क पे
लगायें ठहाके जी भर के
जैसे की बच्चें किया करतें हैं
आओ करें कुछ हंसी ठिठोली
हम आपने आप से
जो छुट गया कहीं पीछे
आओ बुलाएँ अपना बचपन
वो सादगी वो निडरता
जो बेरंग जिन्दगी में रंग भर दे
October 3, 2010
कुछ बचा रखना!
ग़मों के पार अगर जाना हो , अपने जख्मों को हरा रखना
गर ख्वाहिश हो आसमां की तो , उम्मींदो का बाग़ भरा रखना...
ज़िन्दगी की उमस भरी दोपहरी में , कुछ खुशनुमा आवोहवा रखना
दर्द और बढ़ाएंगे ये दुनियावालें , पास में दर्दें दिल की दवा रखना...
जहर घोलतें हैं लोग मीठी बातों से , ऐसे लोगों से खुद को जुदा रखना
हो जुदाई ही मयस्सर कहीं जो उल्फत में , यार को मान के दिल में खुदा रखना...
हौंसलो की भी आजमाइश हुआ करती हैं , अपने पाओं को धरती में जमा रखना
पावों के नीचे से छीन ले जमीं दुनिया , इससे पहले बचा के कुछ आसमां रखन...
कहीं कुतर न दें वो पंख फरफराए तो , अपने अरमानों को दिल में दबा रखना
छिन न लें कहीं वो खुश होने की वजह , अपने आखों में ही सपनों का पता रखना...
मिले न प्यार जमाने का कोई बात नहीं , अपना प्यार अपने वास्ते बचा रखना
न होने पाए कभी विरान ये दिल की दुनिया , हर कोने में जला के शमां रखन...
गर ख्वाहिश हो आसमां की तो , उम्मींदो का बाग़ भरा रखना...
ज़िन्दगी की उमस भरी दोपहरी में , कुछ खुशनुमा आवोहवा रखना
दर्द और बढ़ाएंगे ये दुनियावालें , पास में दर्दें दिल की दवा रखना...
जहर घोलतें हैं लोग मीठी बातों से , ऐसे लोगों से खुद को जुदा रखना
हो जुदाई ही मयस्सर कहीं जो उल्फत में , यार को मान के दिल में खुदा रखना...
हौंसलो की भी आजमाइश हुआ करती हैं , अपने पाओं को धरती में जमा रखना
पावों के नीचे से छीन ले जमीं दुनिया , इससे पहले बचा के कुछ आसमां रखन...
कहीं कुतर न दें वो पंख फरफराए तो , अपने अरमानों को दिल में दबा रखना
छिन न लें कहीं वो खुश होने की वजह , अपने आखों में ही सपनों का पता रखना...
मिले न प्यार जमाने का कोई बात नहीं , अपना प्यार अपने वास्ते बचा रखना
न होने पाए कभी विरान ये दिल की दुनिया , हर कोने में जला के शमां रखन...
October 2, 2010
आओ मन की आंख से देखे
क्रोध और नफरत के नीचे, दबा हुआ होगा कहीं प्यार
निर्बल दुर्बल असहाय सा , करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
उलझी -उलझी अनसुलझी सी, अव्यक्त है मन की भाषा
अकड़ी जकड़ी अन्तर्द्वंद में, अभिव्यक्ति चाहे अभिलाषा
अपनेपन से अपनेमन का, अभी अधूरा साक्षात्कार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
धोखा और फरेब की जननी , पाने और खोने की चिन्ता
भय और आक्रोश की जननी , अच्छा बुरा होने की चिन्ता
सच्चाई और अच्छाई पर, बढ़ता जाता अत्याचार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
दुःख का भय और सुख की चिन्ता , आत्म-प्रलोभन आत्म-विकार
समभावना समकामना सच्चे जीवन का आधार
कम क्रोध और लोभ मोह में फंसा हुआ आचार - विचार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
निर्बल दुर्बल असहाय सा , करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
उलझी -उलझी अनसुलझी सी, अव्यक्त है मन की भाषा
अकड़ी जकड़ी अन्तर्द्वंद में, अभिव्यक्ति चाहे अभिलाषा
अपनेपन से अपनेमन का, अभी अधूरा साक्षात्कार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
धोखा और फरेब की जननी , पाने और खोने की चिन्ता
भय और आक्रोश की जननी , अच्छा बुरा होने की चिन्ता
सच्चाई और अच्छाई पर, बढ़ता जाता अत्याचार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
दुःख का भय और सुख की चिन्ता , आत्म-प्रलोभन आत्म-विकार
समभावना समकामना सच्चे जीवन का आधार
कम क्रोध और लोभ मोह में फंसा हुआ आचार - विचार
निर्बल दुर्बल असहाय सा, करता होगा हाहाकार
आओ मन की आंख से देखे , अंतरतम में झांक के देखें
राजनीती
बाँट रहा है देश को कोई , जनता आँखे मूंद रही
क्यों जन मन के लिए नाकाफी, राष्ट्र प्रेम की बूँद रही
लगा के कोई आग दिलो में , आपनी रोटी सेंक गया
फंसा देश क्यों जान बुझकर , जाल सिकारी फेंक गया
कर्णधारों ने चुप्पी साधी , करुणा न इक फूट सका
तभी इक पथभ्रष्ट लाल ही , अमन देश का लूट सका
पूछ रही है भारत माता , हाय ये कैसी अनीति है
नफरत ही नफरत हो दिल में , यही राज की निति है
क्यों जन मन के लिए नाकाफी, राष्ट्र प्रेम की बूँद रही
लगा के कोई आग दिलो में , आपनी रोटी सेंक गया
फंसा देश क्यों जान बुझकर , जाल सिकारी फेंक गया
कर्णधारों ने चुप्पी साधी , करुणा न इक फूट सका
तभी इक पथभ्रष्ट लाल ही , अमन देश का लूट सका
पूछ रही है भारत माता , हाय ये कैसी अनीति है
नफरत ही नफरत हो दिल में , यही राज की निति है
बड़ी बुरी महंगाई है
सूखी रोटी खाना मुश्किल , सब्जी दाल है लाना मुश्किल
सर पे शामत आयी है , बड़ी बुरी महंगाई है
महंगाई मुँह फाड़ खड़े , बनेंगे कैसे दही बड़े
दूध की कीमत बढती जाए , महंगाई सर चढ़ती जाए
सपना हुयी मलाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
जेब है खाली कैश नहीं , चूल्हा है पर गैस नहीं
पानी से न भूख दबा , आखिर किसपर चढ़े तबा
पेट में आग लगाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
अधनंगे, अधपेटे हैं , पेट पकरकर लेते हैं
महंगाई अब हंसती है, अपने बंधन कसती है
आपने पर फैलाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
ठगे - ठगे से लोग खड़े , नेता मिलकर पेट भरे
आपने हिस्से बाँट रहे , सुख सुविधा सब चाट रहे
दुनिया देती दुहाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
सर पे शामत आयी है , बड़ी बुरी महंगाई है
महंगाई मुँह फाड़ खड़े , बनेंगे कैसे दही बड़े
दूध की कीमत बढती जाए , महंगाई सर चढ़ती जाए
सपना हुयी मलाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
जेब है खाली कैश नहीं , चूल्हा है पर गैस नहीं
पानी से न भूख दबा , आखिर किसपर चढ़े तबा
पेट में आग लगाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
अधनंगे, अधपेटे हैं , पेट पकरकर लेते हैं
महंगाई अब हंसती है, अपने बंधन कसती है
आपने पर फैलाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
ठगे - ठगे से लोग खड़े , नेता मिलकर पेट भरे
आपने हिस्से बाँट रहे , सुख सुविधा सब चाट रहे
दुनिया देती दुहाई है , बड़ी बुरी महंगाई है
October 1, 2010
सुमन
सदा सुमन की तरह
बड़ा सा दिल रखो अपना .. खुले गगन की तरह,
रहो बेख़ौफ़ बेपरवाह .. मलय पवन की तरह,
न चुभो तीर बनके दिल में , किसी चुभन की तरह,
रहो बिखेरते खुश्ब्हू , सदा सुमन की तरह
बड़ा सा दिल रखो अपना .. खुले गगन की तरह,
रहो बेख़ौफ़ बेपरवाह .. मलय पवन की तरह,
न चुभो तीर बनके दिल में , किसी चुभन की तरह,
रहो बिखेरते खुश्ब्हू , सदा सुमन की तरह
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मैं भी रोया तू भी रोई , पर रोने से क्या होता है मैं तेरा हूँ तू मेरी है , जुदा होने से क्या होता हैं है कौन भला इस दुनिया मे...
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ग़मों के पार अगर जाना हो , अपने जख्मों को हरा रखना गर ख्वाहिश हो आसमां की तो , उम्मींदो का बाग़ भरा रखना... ज़िन्दगी की उमस भरी दोपहरी ...
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मैं भी भली हूँ और तू भी भला है , फिर क्यूँ कह रहे हो जमाना बुरा है जो हम तुम निभाते रहे कसमें -वादे , क्यों हो बेवफाई ये...